हमारे ऐतिहासिक गर्व को  ‘जूठन’ का तमाचा

सालभर पहले जब मेरे एक मराठी दोस्त के पास मैंने इस किताब को देखा था तो समझ गया था कि कोई मार्मिक उपन्यास होगा. उसने भी मुझे इसको पढ़ने की सलाह दी थी लेकिन मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. लेकिन पीछले सप्ताह मॉल में ऐसे ही घूमते हुए जब जूठन को देखा तो हाथ में लेने से अपने को रोक नहीं पाया. फिर उलट पलट करने के बाद खरीद ही लिया जबकी मैं फैसला करके गया था कि मॉल से कुछ खरीदूंगा नहीं क्योंकी मैं बिना जरूरत के भी चीजें खरीद लेता हूं. जिससे मेरा वित्त प्रबंधन बिगड़ जाता है.

किताब घर लाकर मैं आशंकित था कि इस किताब का भी हाल इस साल के मेरे अन्य किताबों की तरह न हो जाये जिन्हें अभी तक मैंने पूरा नहीं किया है. लेकिन अंततः 3 दिनों में जूठन के दोनों खंड पढ़ चूका हूं.

जूठन न सिर्फ ओमप्रकाश वाल्मीकि जी कि आत्मकथा थी बल्कि मैं भी अपने फ्लैशबैक में चला गया था. मैं वाल्मीकि जी कि तरह उस जातीय प्रताड़ना को झेला तो नहीं था लेकिन स्थिति को मैं जीवंत देख पा रहा था. वाल्मीकि जी जब बताते हैं कि उनकी बस्ती के लोग किसी कार्यक्रम में कैसे बचे हुए जूठन का अपनी थाली में इंतजार करते थे. उस अमानवीय तरीके को भी लोग मजबूरी में खुशी से सहन करते थे.
मेरे गॉव में अभी भी डोम समुदाय के लोगों को किसी समारोह में सभी के खाना खिला देने के बाद खिलाया जाता है वह भी उस सम्मान के साथ नहीं जैसा की बाकी लोगों को खिलाया जाता है. अब लोग बस इतने मानवीय हैं कि जूठन नहीं देते बाकी किसी बात में कोई तब्दीली नहीं आई है. अभी भी मायें अपने बच्चों को कहती हैं कि “बबुआ डोमवा में मत छुअईह” यह एक जातीय दंभ तो है ही लेकिन इसका कारण वे बच्चों को डोम समुदाय द्वारा सूअर पालना बताती हैं.

मुझे जूठन के एक एक शब्द अंदर से झकझोर रहे थे. मैंने अपने छोटे से करियर में ही पढ़े लिखे संभ्रांत और अपने को प्रगतिशील कहने वाले लोगों को जातीय दंभ में जीते देखा है. चाहे वो राजस्थान का चुरू हो या उत्तर प्रदेश का सीतापुर या लखनऊ हर जगह जातीय श्रेष्ठता पाले लोगों से सामना हुआ है. अलग बात है उसका मैं शिकार नहीं हूं. लेकिन समान्य चर्चाओं में ही उनके गर्व दिखने लगते हैं.

जूठन का पहला खंड जिसमें ओमप्रकाश वाल्मीकि जी अपने शुरूआती जीवन जो उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अपने गॉव में बिताये, ज्यादातर उसका जिक्र किया है.
यह खंड पढते हुए  मुझे  4 महीने पहले अपने बाबा के तेरहवीं के दिन के तस्वीरें याद आने लगीं थी. हम 21 सदी में भी कहां ही मानवीय हो पाये हैं. मेरे यहां भी ढ़ेरों स्वादिष्ट व्यंजन बने हुए थे. बहुत से लोग आमंत्रित थे, उनमें गॉव के डोम समुदाय भी थे. लेकिन वो सभी के खाने के बाद अंत में सभी के लिए लगाए गए टेबल कुर्सी पर नहीं बल्कि नीचे खाने के लिए बाध्य थे. और उनको खाना भी उस तन्मयता के साथ नहीं खिलाया जा रहा था  जैसा बाकी अतिथियों को. वे भी पता नहीं क्यों इसी में खुश रहते हैं. परिस्थितियां बदली हैं लेकिन इतनी भी नहीं कि हम गर्व कर सकें अपने वर्तमान पर.
शायद कम से कम मैं अब उनको अपने घर के किसी कार्यक्रम में नीचे खाते हुए नहीं देख सकता. जूठन के पढ़ने के बाद मैं इतनी हिम्मत तो कर ही सकता हूं. और मेरी इच्छा है कि मेरे गॉव से भी मेरे जीवनकाल में एक डोम समुदाय का बच्चा ओमप्रकाश वाल्मीकि जी की तरह समाज से लड़ते हुए एक इज्जतदार पद पर आसिन हो. वो केवल नौकरी ही न करे बल्कि ओमप्रकाश जी की तरह समाज को एक आईना भी दिखाये जो कहते हुए नहीं थकती की अब जाति का भेद कहां रह गया है.

जूठन के दूसरे खंड में ओमप्रकाश जी ने अपने पेशेवर जीवन में जाति की वजह से झेले गए भेदभाव को सबूतों के साथ रखा है. वे उन सहकर्मियों और अपने साहित्यकार दोस्तों के किस्से भी सुनाते हैं जो इस समाजिक उत्पीड़न से लड़ने में हमेशा उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे. 
मुझे अफसोस है कि मैं ओमप्रकाश जी से नहीं मिल सकता. लेकिन उनकी आत्मकथा ने बहुत प्रभावित किया है मुझे. मैं यह किताब अपने सभी साथियों को पढ़ने की सलाह दूंगा.

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राजनितिक महात्मा 

​अहिंसा, सत्य, स्वच्छता, सत्याग्रह ऐसे बहुत से शब्द हैं जिनको सुनते ही महात्मा गॉधी की याद बरबस ही आ जाती है. गॉधीजी ने भारतीय सभ्यता के शब्दों को जैसे नये अवतार में ढाल दिया.

ऐसा नहीं है कि यह शब्द हमेशा इज्जतदार ही रहे हों. दूसरे का मज़ाक उड़ाने या नीचा दिखाने में भी यह शब्द आज कल चलन में आ गए है.

जैसे एक उदाहरण से समझते हैं. मैंने बचपन से आजतक ऐसे वाक्य हमेशा अपने सुने हैं कि ‘मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता. मैं गॉधी नहीं हूं जो एक गाल पर मारोगे तो दूसरा बढ़ा दूंगा.’ मैं गॉधी नहीं हूं जो धरने पर बैठूंगा. ईंट का जवाब पत्थर से देना आता है मुझे.

इस तरह का हमारा व्यवहार दिखाता है कि गॉधी जो सामान्य सी दिखने वाली चिजों को करते थे असल मायनों में उसे अपने जीवन में उतारना एक तपस्या ही है. इसिलिए ना चाहते हुए भी महात्मा गॉधी एक अवतार टाईप लगते हैं. कैसे एक इंसान इतनी सामान्य सी जिंदगी जी सकता है गृहस्थ जीवन में रहत हुए.
वह मेरे या करोड़ों लोगों के आर्दश भी इसिलिए हैं क्योंकि उनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं था. जैसा वह दुसरों को सुझाव देते थे. अपने जीवन में उसका वह पालन भी करते थे. उनके बहुत किस्से मशहूर हैं कैसे वह अपने सुझावों का स्वंय पर प्रयोग करते थे फिर दुसरों को सलाह देते थे. 
अपना शौचालय, घर और अपनी चिजों की साफ सफाई और रख रखाव वे स्वंय करते थे. तन पर जरूरी कपड़े ही पहनते थे क्योंकी उनदिनों करोड़ों हिंदुस्तानीयों को भरपूर कपड़ा नसीब नहीं होता था.

बिना चमत्कार वाले आम हिंदुस्तानीयों के तपस्वी थे महात्मा गॉधी. राजनीतिक ताकतों की लालच से दूर एक राजनीतिक महात्मा थे, मोहनदास करमचंद गांधी.

गौतम बुद्ध की विचारों की तरह आज भी महात्मा गांधी के विचार प्रासंगिक हैं. या यों कहें कि राजनीतिक मूल्यों की दरिद्रता में आज वे ज्यादा प्रासंगिक हैं.

मूल्यों की घोर संकट यह है कि आम जनता राजनेताओं से ईमानदारी की कोई अपेक्षा ही नहीं रख रही है.

वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तमाम नकारात्मक बातों के अलावा उन्हें उनके नीजि स्वार्थहिनता, राष्ट्रभक्ति, गरीबी को नजदीक से जीने वाला तथा अन्य नैतिक मूल्यों के लिए भी प्रचारित किया जाता रहा है. वह अपने आप को प्रधानमंत्री के बजाय प्रधानसेवक कहलवाना चाहते थे. लेकिन नतीजे सिफर ही रहे.

 नरेन्द्र मोदी सादगी पसंद नेता तो बिल्कुल ही नहीं. डिजायनर कपड़ों के उनके शौक से तो दुनिया परिचित हो चुकी है. बाकी वह ऐसा कोई भी नैतिक या राजनीतिक मूल्यों को स्थापित नहीं कर पा रहे हैं जिसे विचारों के मतभेद से उपर उठकर कोई नेता अपना सके.

सच्चाई और कर्तव्यनिष्ठता के उलट भ्रष्टाचार ने आमजन के अंदर जड़ बन चूका है. और तमाम राजनीतिक पार्टियां और उनके नेता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भ्रष्टाचार को पोषित पल्लवित ही करते हैं. 

चाहे वो गरीबी से जूझकर राजनीतिक पटल पर छा जाने वाले नरेंद्र मोदी या लालू यादव हों या वसुंधरा राजे, ममता बनर्जी या अन्य. स्वंय हित के लिए यह किसी का भी अहित करने को तैयार बैठे हैं.

महात्मा गांधी के व्यक्तित्व को समझने और अपनाने की जरूरत है. उनसे सिखने के लिए बहुत कुछ है और वह भी सबके लिए राजनेताओं से लेकर एक आम नागरिक तक के लिए.

महात्मा गांधी भारतीय मूल्यों को फिर से चमकाने के लिए आये थे. विचारों को धूमिल होने से पहले उनको अपनाना होगा. उसे सही मायने में चरितार्थ करना होगा.

अगर ऐसा होगा तो हम सबसे बड़े राष्ट्रभक्त होंगे, राजनीतिक और सामाजिक मूल्यों वाले होंगे. एक बेहतरीन संसार का निर्माण कर पायेंगे

गर्व से कहो आप अन्नदाता हो!

ग्रामीण अभिभावक जब बोलते हैं कि कुछ रोजगार या कमाने की व्यवस्था करो तो उसके पीछे एक छिपा हुआ डिस्क्लेमर होता है कि खेती मत करो. आज बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे जहां पेशेवर डिग्रियां बटोरने के बाद युवा उद्यमी कृषि और उसके बाजार संबंधी उद्यमों में दिलचस्पी ले रहे हैं. यह वही लोग हैं जो कृषि को व्यावसायिक उद्योग बनाना चाहते हैं. इस तरह की सोच उन रूढ़ विचारों को खुल्लेआम चुनौति दे रहा है जो सोचते हैं कि कृषि करना घाटे का सौदा है. यह युवा उद्यमी आज बागबानी, डेयरी, पशुपालन, मछलीपालन, मधुमक्खी पालन, तिलहन, फुलों, फलों की खेती में तकनीक, पारंपरिक अनुभवों और मार्केट रिसर्च के बदौलत आज सलाना लाखों करोंड़ों कमाई रहे हैं. और बहुत से लोगों के लिए रोजगार भी पैदा कर रहे हैं.

इनके प्रयासों ने अब उस जन मत को खारिज करना शुरू कर दिया है जो यह मानती है कि कुछ ना कर सको तो खेती करो जिससे खाने को अन्न तो मिल जाये. किसानों को अब बाजार को समझना होगा नहीं तो भविष्य की चुनौतियां उनके लिए हिमालय समान हो जायेंगी.

मेरे परिवार की रोटी दाल भी खेती किसानी से ही चलती है. मैं यह खुद महसूस कर पाता हूँ कि कैसी संकट आन पड़ी है किसानों पर. सरकार चाहकर भी बहुत कुछ नहीं कर पाती किसानों के लिए क्योंकी उस पर विश्व व्यापार संगठन का दबाव बना रहता है सब्सिडी को खत्म करने का और किसानों को उसके हाल पर छोड़ देने का. भारत विश्व व्यापार संगठन के कई सारी शर्तों से अभी बचता चला आ रहा है लेकिन हमेशा बचा रहेगा ऐसी कोई गारंटी नहीं है। वो कहावत है न बकरे की मॉ कब तक खैर मनायेगी। इस समस्या की नींव हमने तभी डाल दी थी जब हमारी डूबती अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए भारतीय बाजार को खुले व्यापार के लिए के लिए खोला गया था।अब खुले बाज़ार का अग्रणी समर्थक देश अमेरिका भी नये राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अपने सुर बदलने लगा है।

क्या है न! किसान भले कुछ मामलों में रूढ़ हों परन्तु डरपोक और आलसी तो बिल्कुल नहीं. जरूरत है किसानों को सूचनाओं और जानकारियों के सदुपयोग की, नई तकनीकों के स्थानियकरण की, पारंपरिक बीजों के संग्रहण की और एक व्यावसायिक एटीट्यूड अपनाने की. किसानों को गर्व करना होगा कि वे भोजनप्रदाता हैं. उनकी ईमानदार मेहनत भारत के विकास में बहुत मायने रखता है. किसानों को अपने आसपास एक सकारात्मक माहौल पैदा करना होगा। कड़ीं मेहनत के अलावा फसल को खेतों में भगवान भरोसे तो छोड़ते ही हैं। कम से कम इतने रिस्क के बाद  बिचौलियों के भरोसे अपने मेहनत की कमाई को बर्बाद होने के लिए नहीं छोड़ सकते। आपको किसान क्लब बनाने होंगे। इसमें सरकार भी नाबार्ड और कृषि वैज्ञानिकों के जरिये आपकी आर्थिक और तकनीकि स्तर पर मदद करती है।

किसानों को अपने पढ़े लिखे बच्चों से यह कहने की हिम्मत करनी होगी की कलक्टर बनना जिंदगी का अंतिम लक्ष्य नहीं है अगर आपके पास अपने गॉव घर की खेती को नई दिशा देने के लिए टिकाऊ विचार और ज़ज्बा है तो गॉव आओ हम तुम्हारा सहयोग करेंगें. और मिलकर भारत निर्माण करेंगे. जिस दिन किसानी एक गर्व वाला पेशा बन जायेगा. इसकी आधी समस्या खुद ब खुद खत्म हो जायेंगी. जो कि निरसता के पर्वतीय स्तंभ पर टिकी पड़ी है. कृषि में रोजगार देने वाले जब आयेंगे तो पलायन की समस्या भी जाती रहेगी जो बिहार की एक ज्वलंत समस्या है।

बाबा की याद

बाबा के साथ यह मेरे बचपन की फोटो है.

वो उनका सपना ही था कि कुछ नाम करना, पढ़ लिखकर भोथर नहीं बनना है.

अभी कुछ दिनों पहले ही बाबा(दादाजी) को फोन किया उनका हालचाल लेने के लिए क्योंकी तब गिरने की वजह से पैर में फ्रैक्चर हो गया था. बेड रेस्ट पर थे.

वे बोले का करsत बाड़s?

मैंने बताया की कॉलेज के विद्यार्थियों के ट्रेनिंग देवे के बा अउर उ लोग के नौकरी लगवावे के बा.

उधर से उनका सवाल तहार नौकरी लाsग गईल?

मैं हंसते हुए अपने नौकरी की कहानी बताता रहा. वे पूरा डिटेल लेते रहे.

मैं जब भी घर जाता था कम से कम एक एक घंटे का सवाल जवाब वाला सेशन जरूर होता था. अब कमी खलेगी बाबा के सवालों का. लोग बाबा की बातों को कम ही काटते थे. लेकिन मैं उनकी बहुत सी बातों से आसानी से असहमत हो जाता था.
उनके पास सामाजिक संघर्षों के बहुतेरे किस्से थे. वह अपनी बात मजबूती से रखने वाले लोगों में से थे.

चुनावी माहौल में आज जहॉ लोग प्रत्याशियों से पैसे ऐंठने के लिए तैयार रहते हैं. वहीं बाबा के मूल्य बहुत मायने रखते थे. उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी/जनता दल के लिए पूरे धन बल के साथ सहयोग किया है. वह भी बिना किसी आर्थिक लालसा के.  प्रत्येक विधानसभा या लोकसभा के चुनाव में अपने घर से खर्चा होते देखा है. इसिलिए जब उन जनप्रतिनिधियों के पास जाने पर आपेक्षित सम्मान न मिला तो हक के साथ उनको हड़काया भी. ऐसा इसलिए कर पाते थे क्योंकि चुनाव के समय उनसे कुछ लेते नहीं थे.
बाबा ब्राह्मणवादी कर्मकाडों के सख्त विरोधी थे. लेकिन तार्किकता को सहज अपनाते थे. सब पढ़े थे इसलिए विरोध कर पाते थे. रामायण, महाभारत, और गीता तो बाबा के सानिध्य में मैं भी पढ़ा था. जब हिन्दी पढ़ने का शौक चढ़ा था.
बाबा सातवीं तक ही पढ़ पाये थे. लेकिन उनके गणितिय कैलकुलेशन का मैं कायल था. सब मुंहजबानी.

अब घर जाने पर बाबा नहीं मिलेंगे. लेकिन मुझे लगता है कि मैं बाबा से अलग हो ही नहीं सकता. आपकी बहुत सारी जीवन संघर्ष की कहानियां मेरे लिए प्रेरणास्रोत हैं.

आपको अंतिम बार नहीं देख पाया. जो कि पलायन का एक दुष्परिणाम भर है.

आपने शान से दुनिया से अलविदा लिया. एकदम शांतिप्रिय तरीके से. जितना देख सकते थे आपने दुनिया को देखा. लेकिन आपके नज़रों के सामने हम कुछ बहुत बड़ा नहीं कर पाए जैसा आप चाहते थे. अफसोस रहेगा इसका. लेकिन वो जरूर करेंगे एक दिन देर से ही सही.

दु:खी तो नहीं हैं लेकिन कमी खलेगी.

इस बार सोचे थे कि आपके साथ अपने DSLR से फोटो खिंचवायेंगे. जिसके बारे में मैंने आपसे कहा था कि कंपनी ने दिया है.

बंगाल के पार की यात्रा

                        

न्यू जलपाईगुड़ी नाम तो बहुत सुना था मैंने लेकिन अब मैं साक्षात वहॉ मौजूद था। लोगों के कद काठी और शक्ल देख कर मैं आश्वस्त हो गया कि मेरी पहाड़ी यात्रा शुरू हो चुकी है। पहाड़ी युवक युवतियों का सैकड़ों का रेला जब ट्रेन से उतरता है तो मुझे बरबस ही दिल्ली याद आ जाती है, जहॉ इनको चिंकी, नेपाली और न जाने किन किन घृणाष्प्रद शब्दों से नवाजा जाता है। वहॉ यह कितने असहज होते होंगे फिर भी बोल नहीं पाते। लेकिन यहॉ इनको कोई डर नहीं था। बेफिकर और बेख़ौफ, हंसी -ठीठोली करते हुए ये दूसरे ट्रेन में सवार हो रहे थे।

मेरी न्यू जलपाईगुड़ी से आगे की यात्रा अब ट्रेन से नहीं बल्की चारपहिया गाड़ियों से होनी थी। न्यू जलपाईगुड़ी और सिलीगुड़ी में ज्यादा कन्फ्यूजियाने की जरूरत नहीं है। सिलीगुड़ी शहर के पास ही है न्यू जलपाईगुड़ी। जैसे बिहार के भभुआ रोड स्टेशन के पास मोहनिया शहर है। यहॉ से गंगटोक का रास्ता अब खतरों से भरा था। इसकी वजह पहाड़ी सड़कें नहीं बल्की हमारी गाड़ी का ड्राइवर थे। वह अधेड़ उम्र के एक फिल्मी इंसान थे। फिल्मी डायलॉग सुनाने के चक्कर में वे कई बार हैंडल छोड़कर पीछे भी घुम जा रहे थे। ममता, मोदी से लेकर वामियों तक को गरिया रहे थे। उनका दावा था कि अगर वह बंगाल के मुख्यमंत्री बने तो कायाकल्प कर देंगे बंगाल का। उनके सामान्य ज्ञान के असंतुलित डोज से हम फंसा हुआ महसुस कर रहे थे।

जैसे-तैसे हम बंगाल के इस पुर्वी इलाके से पूर्व और उत्तर की ओर बढ़ रहे थे वैसे-वैसे हम भारत के 22वें और सबसे खुबसुरत और स्वच्छ राज्यों में से एक सिक्किम के नजदीक जा रहे थे।

यह सीलिगुड़ी से गंगटोक के रास्ते में मिला था.

मैं सिक्किम की हसीन वादियों में इतना खो गया था कि हमारे बिहारी मूल के बंगाली ड्राईवर साहब का बकवास भी मुझे इरिटेट नहीं कर रहा था।

मैं और मेरे तीन साथी दस दिन के लर्निंग जर्नी पर सिक्किम की राजधानी गंगटोक जा रहे थो। उसी में चार दिन निकालकर हमें सिक्किम की वादियों का खुबसुरत नज़ारा भी लेना था। लेकिन सिक्किम घूमने के लिहाज से मई का महिना बेहतर नहीं माना जाता है। खासकर तब जब आप शांतिप्रिय हैं। वैसे यात्रा गाइड करने वाली वेबसाइटों आपको मार्च से जून तक का महिनों में घुमने की सलाह देंगी। छुट्टीयों का महिना के कारण मैदानी लोगों की भीड़ आपको रोमांचित नहीं बल्कि परेशान करेगी। इस दौरान छांगु लेक जैसा खुबसुरत जगह भी सुना सुना सा लगता है। बर्फ जिसकी लालच में हम सिक्किम पहुंचते हैं। वह भी इस दौरान कम ही देखने को मिलता है। नाथुला दर्रे के पास यह कुछ मात्रा में मिल जाता है। वहॉ के स्थानिय मित्रों के मुताबिक मार्च, अप्रैल और अक्टूबर का महिना सबसे हसीन होता है प्रयटकों के लिए क्योंकी तब अच्छी मात्रा में बर्फ से सामना होगा।

सिक्किम में घूमने के लिए बेहद ही खूबसूरत जगहे हैं जैसे

नाथुला दर्रा (Nathula Pass), गुरूदोंगमर घाटी( Gurudongmar Lake)युमतांग घाटी (Yumthang Vally)कंचनजंघा राष्ट्रीय पार्क (Kanchenjunga National park)छांगु लेक ( Tsomgo Lake), नामची का बुद्धा पार्कज़ुलुक वाइल्ड लाइफ क्षेत्र

राजधानी गंगटोक में ही पूरा एक दिन घूमने लायक खूबसूरत जगहे हैं।

बौद्ध विहार, जलप्रपात और कई सारे व्यूप्वाईंट। इनके अलावा भी पर्यटन स्थलों की भरमार है छोटे से सिक्किम राज्य में।

हमने जब अपने जरूरी कामों को निपटा कर घूमने की योजना बनाई तो टॉप लिस्ट में नाथुला दर्रा था। यहॉ बर्फ तो मिलते ही साथ में चीनी बार्डर का भी नज़ारा मिल जाता। भारत-चीनी व्यापार का यह मुख्य द्वार है। इसलिए यह ज्यादा संवेदनशिल इलाका है। यही क्या सिक्किम का भूगोल भारत के लिए रणनितिक रूप से महत्वपूर्ण होने के कारण यहॉ के बहुत बड़े हिस्से पर भारतीय सेना की मौजूदगी देखी जा सकती है। 

सिक्किम की महत्ता को आप ऐसे समझ सकते हैं कि उत्तर और पूर्व में चीन वहीं पूर्व में भूटान तथा पश्चिम में नेपाल और पश्चिम बंगाल सीना ताने खड़े हैं। इन्ही सब कारणों की वजह से यहॉ सेना की तरफ से सुरक्षा के भी पुख़्ता इंतजाम किये जाते हैं। प्रतिदिन कुछ गाड़ियों को (सौ से भी कम) नाथुला का परमिट मिल पाता है। हमारा दुर्भाग्य की हमें दो दिन तक नहीं मिला।

बादलों के बैकग्राउंड में पोज देने का आनंद.

 

बाबा मंदिर के रास्ते में पड़े बर्फ से खिलवाड़

लेकिन हम छांगु लेक और प्रसिद्ध बाबा मंदिर जरुर घूम आये।यहॉ के लिए रोज लगभग बारह सौ गाड़ियों का परमिट जारी किया जाता है। छांगु लेक पहुंचने से पहले हमारे ड्राइवर ने ठंडी हवाओं का दर दिखाकर बहुत ही महंगे गर्म कपड़े हमें किराये पर दिलवा दिया। वैसे इन किरायों के गर्म कपड़ों का थोड़ा बहुत उपयोग हम बाबा मंदिर पर पहुंचने और रास्ते में पड़े बर्फ से खेलने में कर पाये।

बाबा मंदिर किसी देवता या भगवान का मंदिर नहीं है बल्कि यह भारतीय सेना के जवान हरभजन सिंह के स्मृति में बनाई गई है। इसकी कहानी यों है कि हरभजन सिंह अपनी ड्यूटी से वापस नहीं लौटे। न ही उनकी कोई जानकारी मिल पा रही थी।

ऐसी मान्यता है कि सिपाही हरभजन सिंह अपने साथी जवान के सपने में आए और अपने समाधी निर्माण के लिए अनुरोध किया। यह घटना सन् 1968 की है। आज भी लोग बाबा हरभजन सिंह के मंदिर में कई सारी मन्नतें मांगते हैं। लोगों में यह भी प्रचलित है कि बाबा हरभजन सिंह आज भी अपनी ड्यूटी करते हैं।

बाबा मंदिर के पास मे ही एक ठंडे पानी वाला झरना है। यहां पर शिव की एक विशाल प्रतिमा भी लगाई गई है।

बाबा मंदिर के पास वाला झरना

 

छांगु लेक के पास याक की सवारी.

 

बाबा मंदिर से लौटते समय हमारे साथियों ने याक की सवारी का मजा लिया और ढ़ेर सारी फोटुएं खिंचवाई। सिक्किम की वादियों के अलावा वहॉ के लोगों का व्यवहार भी बहुत ही सुंदर और प्रशंसनिय है। यहॉ पर मुख्यत तीन तरह के समुदाय मिलते हैं नेपाली, भूटिया और लेपचा। यहॉ की राजकीय भाषा नेपाली है। आमजन राजनितिक रूप से ज्यादा सक्रिय नहीं हैं। जिसका परिणाम यह है कि पीछले 24 सालों से सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के पवन चामलिंग लगभग निर्विरोध रूप से राज्य के मुख्यमंत्री हैं।

सिक्किम की मुख्य सड़कें सीमा सड़क संगठन के हाथों में है इसलिए सड़कों की स्थिति अच्छी हैं।

यहां पर ट्रैवलिंग का खर्च मुझे महंगा लगा. होटल का किराया सामान्य शहरों की तरह ही था। हमने गंगटोक शहर के चप्पे चप्पे को छान मारा। आसपास की हसिन वादियों का मज़ा लेने के बाद शाम बिताने के लिए सबसे मुफिद जगह है गंगटोक का सबसे खास इलाका महात्मा गॉधी मार्ग जो शिमला के मॉल रोड की याद दिला देगा। यहीं पास में लगा लाल बज़ार बहुमंजिला इमारत की तरह है।

लाल मार्केट से गंगटोक शहर का एक नज़ारा.

 

बारिश के बाद एम जी मार्ग का एक झलक.

 

एम जी मार्ग का उपर से खिंची गई तस्वीर.

जिसमें महात्मा गॉधी मार्ग से घुसकर कई तले नीचे उतरते हुए स्थानीय बाज़ार का आनंद लेते- लेते हम एक सिनेमाघर के पास पहुंच जाते है। लाल बाज़ार के उपरी तले से गंगटोक शहर का दृश्य बहुत ही मनोरम होता है।

सिक्किम में बहुत कुछ घूमने को छोड़ आया हूं फिर भी जितना घूमा वह एक शानदार अनुभव रहा।

मैं परेशान हूं…2

जिंदगी हमेशा मजे में काटते रहता. दुख की परछाई भी मुझे छू न पाती. घर परिवार के सभी सदस्य मुझसे आजीवन खुश रहते, प्रेमिका को मुझसे कभी कोई शिकायत नहीं होती तो सच में मैं जिंदगी नहीं जी रहा होता बल्कि सपनो में जी रहा होता.

लेकिन नहीं मैं तो बिस्तर से दूर सपनों से ब्रेकअप करके यह सोच रहा हूं कि आखिर में जिंदा हूं तो परेशानियां तो होंगी ही फिर मैं परेशान क्यों हूं?

uljhane

अपनी परेशानी की वजह ढूंढना मेरे लिए मुश्किल नहीं है. मुझे अब एहसास होने लगा है कि मैं दुनिया में नफरत फैलने से डरता हूँ. लोगों को एक दुसरे को घटिया साबित करने की बढ़ती प्रवृत्ति से डरता हूं. अपने गॉव के भोले, ईमानदार, मेहनती और मिलनसार लोगों को दुनियावी दानव बनते हुए देखकर डरता हूं. बाप को अपनी झूठी इज्जत की शान में बेटी का गला दबाते देखकर डरता हूं. भारत की आधी आबादी के पेशे किसानी की दयनीय हालात देखकर डरता हूं.
यही डर मुझे परेशान किये हुए हैं जो कि हमारे वर्तमान के साथ – साथ भविष्य को भी खतरे में डाल दिये हैं.
अब दुनिया में अपनी जिंदादिली ही काम आयेगी. परेशानियों की वजहों को अश्विन के स्पीन की गति से खात्मा करना होगा.
मुझे लगता है कि मेरी परेशानियां मुझे रास्ता दिखा रही हैं.

आज़ाद मन

बच्चों का मन आज़ाद होता है | उनकी कल्पना की उड़ान की कोई सीमा नहीं और वे कुछ भी सोच सकते हैं | हाँ कुछ भी | घर में शाम के भोजन की क्या व्यवस्था होगी,उसे मतलब नहीं | शाम को उसे शीरा( हलवा का मारवाड़ी नाम ) खाने का मन किया और उसने सुना दिया फरमान अपनी माँ को | वो तो आज शीरा  ही खायेगा|  माँ का वो दुलारा है तो माँ कैसे भी जुगाड़ कर के बना ही देती है शीरा|


जिसकी मैं बात कर रहा हूँ वो एक बहुत ही प्यारा और दुलारा बच्चा है लीलाधर | ९ साल का लीलाधर चौथी कक्षा में पढ़ता है | मेरी इससे मुलाकात को पूरा एक साल हो गया है| शुरू शुरू में मुझे बच्चों से ज्यादा लगाव नहीं था | लेकिन लीलाधर जैसे बच्चों के  आस पास रहने  पर इनसे प्यार हो जाना लाजिमी सी बात है | स्कूल में अपने काम के समय मैं जब भी लीलाधर की कक्षा के अलावा अन्य कहीं और होता था तो वो मुझे बार बार बुलाता था की भइया मेरी क्लास में  आओ |और जब भी मैं उसकी क्लास में होता था तो वो अपनी पेन किताबें पेंसिल शार्पनर (मारवाड़ी में इसे संचो बोलते हैं) की ही दुनिया में खोया रहता था | क्लास का पूरा समय वो पेंसिल को शार्प करने में ही लगा रहता था | जब भी मैं  उससे बातें करता हूँ तो उसके सवाल और जवाब मेरे मन को गुदगुदा देते हैं | एक बार मैने महीने भर शेविंग नही की थी | चेहरे पर ख़ासी घनी दाढ़ी आ गयी थी | मैं उसी तरह से स्कूल गया तो लीलाधार ने कहा कि भईया आप दाढ़ी कटवा लो | मैने हंसते हुए कहा ‘पैसा नही है लीलाधर ‘ | जवाब आया ‘मैं दे दूँगा भैया’ | ऐसे ही जाने कितनी बातें है उससे जुड़ी हुई जो याद आने पर मुझे हंसा देती हैं | अभी कुछ दिनों पहले फिर  मुलाकात हुई तो लीलाधर अपनी चंचलता के साथ क्लास में ध्यान भी केंद्रित  कर रहा था | वो मेरे सवालों का विश्लेषणात्मक जवाब दे रहा था | मैं खुश हुं उसकी प्रगति को देखकर | मैं खुश हूं उसके फनी सवालों को सुनकर | क्योंकि वो सोचता है | उसने अपने सवालों को सीमाओं से नहीं बांधा है|

एक वाक़या मैं आपको और सुनाता हूं जो लीलाधर से अलग है | मेरा एक साथी जहां हम रहते हैं वहां से साठ किमी दूर के स्कूल में जाता है |  एक दिन वहां के एक बच्चे ने कहा ‘भईया आप मोटरसाईकिल से क्यों आते हैं ? आपका तेल भी खर्च होता है और थकान भी होती होगी | ऐसा कीजिए आप मोबाइल वाले टॉवर पर चढ़ जाईए, हम नीचे से उसको हिलाएंगे तो आप सीधे जाकर अपने घर में गिरेंगे |तुरंत पहुंच जायेंगे ,और सबकुछ बच जायेगा’| यह है बच्चों का चंचल मन जो तर्क की सीमाओं से आज़ाद है | उनके मन के शहर में आज़ादी है खुल कर सांस लेने की | ये शहर उनके भीतर बसा है | हमें भी सीखना चाहिए उनसे|

मैं परेशान हूं…..

मैं परेशान हूं। किसी लड़की, बिमारी या नेता से नहीं बल्की अपने आप से। लड़की से परेशान होता तो उससे दूरी बना लेता, नेता से परेशान होता तो दोस्तों के बीच उसकी इज्जत की धज्जियॅा उड़ाकर कलेजे को ध्रुवों वाली ठंडक फील करा देता और बिमार होता तो दवाईयॉ लेता और मम्मी के पास रहता। लेकीन नहीं मैं परेशान हूं अपने आप से।
मैं कई दिनों से सोच रहा हूं की आखिर मैं परेशान क्यों हूं। इसी सोचने की प्रक्रया में मैं अपनी जिंदगी के फ्लैसबैक में चला गया और उस दौरान की ढ़ेर सारी सबूतें ईक्ट्ठे कर लाया जिससे की मैं साबित कर सकूं की मैं बचपन से ही परेशान हूं! ऐसा ईसलिए करना चाहता था क्योंकी मुझे अपनी जवानी की समझ पर पूरा भरोसा था कि अब मैं अपनी परेशानियों का कारण स्वयं नहीं हो सकता हूं। सबूतों का नमूना जो मैंने वर्तमान की परेशानियों का कारण भूत पर थोपने के लिए निकाले–
1. मैं हिंदी माध्यम स्कूल में ही पढ़ पाया(सोच तो ऐसे रहा हूं जैसे अंग्रेजी माध्यम से पढ़ लेता तो फेसबूक का फाउंडर मैं ही होता!!!)
2. घर वालों ने क्रिकेट में दिलचस्पी शुरू होते ही यह कहते हुए खत्म कर दी कि पढ़ ले बेटा वरना खेत में ट्रैक्टर चलाना पड़ेगा।( शायद ऐसा नहीं हुआ होता तो आज भारतीय वनडे टीम की कप्तानी के लिए कोहली के साथ मैं भी कतार में होता!!!!)
3. मुझे क्लास में  कभी भी प्रथम स्थान नहीं मिला।( अगर एकबार भी टॉप करता न! तो ईसरो का डाईरेक्टर तो मैं ही बनता!!!)

लेकिन नहीं ये सब मेरी वर्तमान परेशानियों का कारण कैसै है? ये मैं समझ नहीं पाया इसलिए उपर वाला लॉजिक निरस्त…….अाखिर मैं परेशान हूं क्यों इसकी पड़ताल अगले ब्लॉग में करूंगा।

शहाबुद्दीन की रिहाई से क्यों परेशान हैं नॉन रेजिडेंट बिहारी? 

अगर सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं तो आपने देखा होगा आपके फ्रेंड लिस्ट वाला ज्यादातर बिहारी जो की बिहार में रहता ही नहीं है या यों कहें नॉन रेजिडेंट बिहारी हैं. वो शहाबुद्दीन की रिहाई के फैसले से खुश नहीं हैं. खूब लिख रहा है बोल रहा है इस मुद्दे पर. भले ही वह विधानसभा चुनाव में लालू-नीतिश को भरपूर समर्थन किया हो. उस समय वह लोकतंत्र को अपनी तरीके से परिभाषित करने वाले उन मोदी समर्थकों के खिलाफ भी खड़ा था जो लोकसभा 2014 के चुनाव में बिहार में मोदी को बढ़त मिलने पर बिहारियों की दूरदर्शिता का गुणगान कर रहा था और 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा के हार पर बिहारियों को मूर्ख, जातिवादी और न जाने क्या-क्या कह रहे थे. लेकिन वह लालू-नीतिश की समाजिक न्याय के पक्षधर वाले रवैये का समर्थन करते हुए भी आज बिहार सरकार के शहाबुद्दीन केस में ढुलमुल रवैये से चिंतित है.

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ऐसा नहीं की वह केवल शहाबुद्दीन के जमानत पर बाहर आने भर से परेशान है. उसे बिहार के उस चेहरे से परेशानी होती है जिसमें सुनील पांडे, हुलास पांडे,सूरजभान सिंह, मुन्ना शुक्ला,सूरजभान सिंह, ब्रहमेश्वर मुखिया, अनंत सिंह और पप्पू यादव जैसे बाहुबली नेता दिखते हैं. पहले तो यह गुंडा होते हैं समाज के लिए लेकिन साथ ही साथ ये अपने जाती/समुदाय के लिए लगभग हीरो होते हैं. इसके बाद ये अपनी गुंडई के बदौलत राजनीतिक पार्टियों के खेवैया बन जाते हैं. राजनीतिक ताकत मिलते ही ये कानून को अपने हाथ में ले लेते हैं. फिर शुरू होती है लूटपाट, डकैती, राजनीतिक हत्याएं. इनके राजनीतिक संरक्षक का इनको भरपूर समर्थन मिलता है. इनमें कोई भी पार्टी पीछे नहीं है चाहे वो राजद हो, जदयू हो, भाजपा हो, लोजपा हो या कांग्रेस.

आप सोच रहे होंगे कि इससे नॉन रेजिडेंट बिहारी क्यों परेशान होता है वो तो बिहार में रहता ही नहीं.

यही तो परेशानी की बात है उसके लिए की वह बिहार में नहीं रहता.  वह देश के हर कोने में फैला हुआ है. और वहॉ वह बिहार का प्रतिनिधित्व करता है. इसमें दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, देशभर की विभिन्न शिक्षा संस्थानों में पढ़ने वाला छात्र हो या नौकरीपेशा सरकारी कर्मचारी या देशभर में पलायन को मजबूर मजदूर सबको बिहार की परिस्थितियों पर लोगों को जवाब देने पड़ते हैं. लोगों के तीखे पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है.

मैं अपना ही बारे में बताता हूँ. मैं गॉधी फेलोशिप के जरिए राजस्थान के पिछड़े जिलों में से एक चुरू के सुजानगढ़ तहसील में सरकारी स्कूलों और ग्रामीणों के साथ काम कर रहा हूं.  जब पहली बार लोगों से परिचय होता है तो मेरे बिहारी होने का पता चलने पर उनका सवाल यही होता है कि बिहार में खूब गुंडागर्दी होती है न? गुंडे खुलेआम घूमते हैं? वहॉ राजस्थान जैसे शांतिपसंद लोग नहीं होते?

अब हम उन्हें स्पष्टीकरण देते-देते थक जाते हैं और अंत में कहते हैं मीडिया में जो बातें आप देखते,  सुनते हो वह पूरी तस्वीर नहीं होती. कभी हमारे गॉव आईये फिर देख समझ के बिहार के बारे में विचार बताईयेगा. तब कहीं जाकर वे थोड़ी देर के लिए बिहार की सकारात्मक छवि की कल्पना करते हैं.

लेकिन अभी शहाबुद्दीन की जमानत पर हुई रिहाई के बाद लोगों को अब मेरे स्पष्टीकरण पर से भी भरोसा उठ रहा है.

इसलिए परेशान हैं मेरे जैसे नॉन रेजिडेंट बिहारी क्योंकी उन्हें रोज स्पष्टीकरण देना पड़ता है देशवासियों को. फिर लोग हमारे अच्छे कामों के नियत पर भी खाली बिहारी होने के कारण ही शक करने लगते हैं. बस हमें उसी से डर लगता है. इसलिए ही परेशान हैं और जहॉ तक हो सके अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं राजनीति का बाहुबलीकरण करने पर. अब हम अपनी कमी पर आवाज़ नहीं उठायेंगे तो कौन उठायेगा? हम इस तर्क से भी अपने गलत राजनीतिक परंपरा का बचाव नहीं कर सकते की यह बाहुबलीकरण तो देश के अन्य राज्यों में भी है.

नई शुरुआत

जीवन में कुछ अच्छी बातें आराम से हो जाती हैं और हमें पता भी नहीं होता है | लेकिन खराब बातें बिना हंगामे के नहीं होता | खैर हंगामा खड़ा करना हमारा मकसद तो नहीं इसलिए मैं आपलोगों से कुछ बातें साझा करना चाहूंगा जो पिछले एक सप्ताह से मैं अनुभव कर रहा हूं|
इन दिनों में मेरे बहुत सारे पूर्वानुमान भरभरा के गिरे हैं| दोस्ती के हाथ बढ़ाने के नए तरीके सीखें हैं| लोगों के आरामतलबी के आसमान से नीचे उतर कर कष्ट के स्तर पर खड़े होते देखे| अलग-अलग तरह से सोचने वाले लोगों को धैर्यपूर्वक अपनी बात रखते और सुनते देखा| एक झलक झुंझुनूं के एक गॉव और उसके सरकारी स्कूल का भी मिला |
इन सारी बातों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया| उन्हीं बातों में ढ़ेर सारे मजेदार पहलू भी मिले………..
गॉधी फेलोशिप की मेरी यात्रा की शुरुआत 1 जून से झुंझुनूं के बगड़ में शुरू हुआ जो पीरामल का गॉव है| गॉधी फेलोशिप में काम शुरू करने से पहले यहां(Piramal education leadership में) एक ट्रेनिंग प्रोग्राम(induction) होता है| इसमें फेलो के इरादों को और दृढ़ किया जाता है| समाज और लोगों को देखने के नजरिये में सकारात्मकता भरी जाती है| अपने व्यक्तिगत सपने के बारे में सोचने के लिए प्रेरित किया जाता है|
इस induction में दोस्ती करवाने के तरीके ने तो मुझपर बेहतरीन छाप छोड़ा | छोटे-छोटे समूह बनाया गया और कहा गया कि आप अपनी जिंदगी की सारी बातें अपने समूह

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में साझा कर सकते हैं|
ये अपनी कहानियॉ साझा करने वाले आईडिया ने तो गज़ब का काम किया और कईयों को दो दिन के मुलाकात में ही एक दूसरे के बहुत नजदीक ला दिया|
मुझे भी बहुत करीबी लोग मिले| कुछ एेसे लोगों के तरफ भी मैंने दोस्ती का हाथ बढ़ाया जिनसे मैं पहले दूर ही रहता था| अब वो मुझमें एक अच्छा दोस्त देखते हैं| मैं पहले से ही सकारात्मक था लेकिन अब और सकारात्मकता फील कर रहा हूं|
मुझे तो ये सब बताने में मजा़ आ रहा है लेकिन आपकी धैर्य की परीक्षा न लेते हुए इसको यहीं खत्म करता हूं लेकिन स्कूल विजिट वाली मजेदार बाते अगली कड़ी में साझा करूंगा|